चंद्रपुर ५०० वर्ष से अधिक की ऐतिहासिक परंपरावाला शहर है। यहां बौध्द संस्कृति, हेमाडपंथ के स्थापत्य और गोंड राजाओं के अद्भूत निर्माण के प्रमाण आज भी इसकी प्राचीनता का प्रमाण देते डंटे दिखते है। स्वाधिनता आंदोलन के दौरान चिमूर क्रांती तो स्वाधिनता के बाद बाबासाहब आंबेडकर की दिक्षाक्रांती के अध्याय के बीच ही जैन धर्मियों का शतक पार करनेवाला मंदिर और भद्रावती में बसा जैनों का विश्वविख्यात तिर्थस्थल है।
सांस्कृतिक क्षेत्र को समृध्द करनेवाले कई कलाकार -लोककलाकारों की यहां अपनी परंपरा अपने समय रही, आज भी यह चल ही रही है। इतनी बडी पृष्ठभूमिवाले इस प्राचीन सांस्कृतिक महानगर में आम जन को अधिकार का सांस्कृतिक मंच नहीं था। परंपरा को तोडने का साहस कोई कर नहीं रहा था। कुछ गीने चूने लोग ही यहां के सांस्कृतिक सिपाहसालार बने थे। ऐसे में अधिकार के सांस्कृतिक मंच के अभाव की घूटन एक सामान्य लेखक ने दूर की और ऐसा इतिहास रच दिया कि आज उसकी वह कोशिश शहर का सांस्कृतिक गौरव बन गयी है। उस अधिकार के सांस्कृतिक मंच का नाम है ‘सृजन’..
इस तरह से हुआ सृजन

अतिथि के पहले कार्यक्रम
हर माह एक कार्यक्रम
जब तक श्रोता चाहेंगे…
एक सामान्य मजदूर को दिया मंच और सम्मान

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